भारत का मौजूदा वित्तीय संकट साल 2008 से अलग, बैडलोन के बाद नोटबंदी ने बिगाड़ी चाल


  • भारतीय अर्थव्यवस्था साल 2007 से 2012 के दौरान जिस वक्त अपने उच्चतम स्तर पर थी, उसी दौरान सबसे ज्यादा कर्ज दिया गया, जो बैड लोन की वजह बना।

Moneybhaskar.com

Mar 17,2020 05:03:24 PM IST

नई दिल्ली. भारत की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों से खराब चल रही है। जांच एजेंसियों और केंद्रीय बैंक की ओर से इस दौरान करीब तीन प्रमुख फाइनेंस कंपनियों को सीज कर दिया गया है। साथ ही केंद्रीय बैंक को पिछले दो साल में तीन बार लोगों को भरोसा दिलाना पड़ा कि उनका पैसा सुरक्षित है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का मौजूदा वित्तीय संकट साल 2008 के वित्तीय संकट से काफी अलग है। 2008 में जहां अमेरिकी फाइनेंस कंपनियां संकट में आई और समस्या खड़ी हुई तो इस बार समस्या काफी हद तक देश के भीतर से ही शुरू हुई है। सरकार के पास चुनौतियां कई हैं- सबसे बड़ी चुनौती ग्रोथ बढ़ाने को लेकर है साथ में बैड लोन की समस्या सरकार के सामने एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ऐसे में क्या सरकार को अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की वाहवाही लूटनी चाहिए या फिर दुनिया के सबसे खराब बैड लोन रेशियो को खत्म करने की दिशा में काम करना चाहिए?

आर्थिक ग्रोथ में आ रही कमी की बड़ी वजह

भारतीय अर्थव्यवस्था साल 2007 से 2012 के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर थी, उसी दौरान सबसे ज्यादा कर्ज दिया गया, जो बैड लोन की वजह बना। इस दौरान बैंक की ओर से 400% ज्यादा तादाद में लोन दिया गया। अर्थव्यवस्था में सुस्ती का दौर उस वक्त शुरू हुआ, जब कई कंपनियां कर्ज चुकाने के लिए संघर्ष करने लगी। इससे बैंक ज्यादा ब्याज देने से बचने लगे। इससे कारोबार के लिए मार्केट में पैसे की कमी हो गई। इन्हीं वजहों से भारत की अर्थव्यस्था की रफ्तार सुस्ती होती गई। इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विस लिमिटेड (IL&FS) साल 2018 में भारत की पहली नॉन बैंकिंग कंपनी थी, जो कर्ज न चुकाने के चलते डूबने की कगार पर पहुंची और सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसे 2008 की अमेरिका की लेहमैन जैसी घटना माना जा रहा है।

आईएलएंडएफएस के डूबने के बाद से अब तक क्या हुआ

IL&FS के कर्ज में डूबने की वजह क्रेडिट की कमी थी। इसके बाद दीवान हाउसिंग फाइनेंस समूह (डीएचएफएल) भी इसी तरह के संकट में फंसा। डीएचएफएल का भी कंट्रोल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अपने हाथों में लेना पड़ा। इसी तरह कुछ छोटी कर्जदाता कंपनियां भी 2019 में डूब गई और उनकी जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंप दी गई है। साथ ही रिजर्व बैंक ने उनका कंट्रोल भी अपने हाथ में ले लिया है। 2020 में यस बैंक नकदी की समस्या से बंद होने की कगार में पहुंच गया। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने यस बैंक से धन निकासी पर रोक लगा दिया था और सरकार के हस्तक्षेप के बाद एसबीआई के नेतृत्व में कई बैंक और वित्तीय संस्थानों को यस बैंक के रेस्क्यू के लिए आगे आना पड़ा।

यस बैंक के साथ क्या हुआ?

यस बैंक के पूर्व चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर और को-फाउंडर राना कपूर के नेतृत्व में बैंक का तेजी से विस्तार किया गया। उनके कार्यकाल के आखिरी साल मार्च 2018 में यस बैंक देश में सबसे ज्यादा लोन देने वाली बैंकों में एक बन गई। क्रेडिट सुइस ने साल 2019 की रिपोर्ट में कहा गया था कि कंपनी ने उन कारोबारियों को सबसे ज्यादा लोन दिया, जो पहले से कर्ज में डूबे थे।

समस्या सुलझाने के लिए अथॉरिटी क्या कर रही हैं?

बैड लोन बढ़ने से अर्थव्यवस्था को नकुसान बढ़ने की आशंका जाहिर की गई। इसके बाद आरबीआई ने 2015 में बैड लोन की स्थिति जानने के लिए गण्ना शुरू की, जिससे समस्या का पूरा स्वरूप सामने आया। बैंकिंग सेक्टर में नॉन परफार्मिंग एसेट्स 3% बढ़कर 9% से ज्यादा हो गया। इसके बाद, सरकार बैड लोन की रिकवरी के लिए नया दिवालियापन कानून लेकर आई। इन सब के बावजूद अर्थव्यवस्था में गिरावट आई तो अधिकारियों ने ताजा लोन लेने और कुछ उधारकर्ताओं और छोटे व्यवसायों की ओर अधिक उदारता दिखाने के लिए कदम उठाए। भारतीय रिज़र्व बैंक ने पिछले साल बताया कि एनपीए में कमी आई है। इसके अलावा आईएलएंडएफएस और यस बैंक के डिफॉल्टरों से वसूली के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

क्या आगे भी बैड लोन और फाइनेंस सेक्टर में ऐसी मुसीबतें आएंगी?

ग्लोबल रेटिंग्स एजेंसी S&P ने चेतावनी दी है कि यस बैंक का बेलआउट पैकेज का साइड इफेक्ट काफी खतरनाक हो सकता है। आरबीआई के तहत रेस्क्यू प्लान में कुछ निवेशकों को हाइब्रिड बॉन्ड जारी करने की योजना प्रस्तावित है। फिच रेटिंग्स का कहना है कि भारत के घरेलू रिटेल लोन मार्केट को भरोसा बनाने के संकट का सामना करना पड़ सकता है। देश के चौथे सबसे बड़े निजी कर्जदाता यस बैंक और अन्य बैंकों, म्युचुअल फंड और बीमाकर्ताओं के बीच करीबी संबंध होने से फाइनेंस सेक्टर में रिस्क बढ़ता है। भारत की धीमी अर्थव्यवस्था को कोरोनोवायरस महामारी के कारण और अधिक खतरा है।

आरबीएल का डिपॉजिट घटा

निजी कर्जदाता आरबीएल बैंक ने गुरुवार को कहा कि सरकारी संस्थाओं और संस्थागत निवेशकों के पैसा निकालने की जगह से उसे कुल जमाखातों में पिछले एक हफ्ते में करीब 3 फीसदी का नुकसान हुआ है। हालांकि इससे रिटेल डिपॉजिटर्स पर ज्यादा प्रभाव नहीं है। 31 दिसंबर तक बैंक का कुल डिपॉजिट करीब 62,907 करोड़ रुपए था। इसमें 16,855 करोड़ रुपए चालू और सेविंग अकाउंट है।



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